*****ज़ौक़******
तेरे कूचे को वोह बीमारे-ग़म दारुश्शफ़ा समझे
अज़ल को जो तबीब और मर्ग को अपनी दवा समझे
सितम को हम करम समझे जफ़ा को हम वफ़ा समझे
और इस पर भी न समझे वोह तो उस बुत से ख़ुदा समझे
समझ ही में नहीं आती है कोई बात ‘ज़ौक़’ उसकी
कोई जाने तो क्या जाने,कोई समझे तो क्या समझे